Ethanol Vs Farmer: इथेनॉल को लेकर पिछले कुछ महीनों से एक ही कहानी बार-बार सुनाई जा रही है की किसान अब “अन्नदाता” नहीं, “ऊर्जादाता” बन गया है। दावा यह है कि इथेनॉल ने किसानों की किस्मत पलट दी। सवाल यह है – क्या यह दावा जमीनी हकीकत से मेल खाता है, या सिर्फ एक अच्छी लगने वाली लाइन है?
जवाब कहीं बाहर नहीं, खुद केंद्र सरकार के कृषि मंत्रालय के आंकड़ों में मौजूद है। एगमार्कनेट का डेटा और मंत्रालय की रिपोर्ट, दोनों मिलकर एक अलग ही तस्वीर दिखाते हैं।
मक्का किसान को क्या मिला असल में
मक्के को लेकर इथेनॉल नीति का सबसे ज्यादा प्रचार हुआ था। किसानों से कहा गया पैदावार बढ़ाओ, मुंहमांगा दाम मिलेगा। किसानों ने भरोसा किया भी।
नतीजा उल्टा निकला। मार्च 2025 से अगस्त 2026 तक, यानी करीब 18 महीने, मंडियों में मक्के का औसत भाव एक बार भी MSP को नहीं छू पाया। मार्च 2025 में जब MSP 2225 रुपये प्रति क्विंटल था, किसान को औसतन 2176.61 रुपये ही मिले। नवंबर 2025 में हालत और बिगड़ी – MSP 2400 रुपये था, लेकिन भाव गिरकर 1634.74 रुपये रह गया। यानी सीधा 765 रुपये प्रति क्विंटल का नुकसान।
अगस्त 2026 की स्थिति भी बहुत अलग नहीं। मक्का आज भी MSP से करीब 391 रुपये नीचे, यानी 2008.69 रुपये पर बिक रहा है।


अगर मांग इतनी ज्यादा है तो भाव नीचे क्यों?
सरकार ने इथेनॉल कंपनियों की लागत घटाने के लिए FCI के गोदामों से 23.20 रुपये प्रति किलो के भाव पर चावल जारी किया। यह किसानों से MSP पर खरीदे गए धान (24.41 रुपये प्रति किलो) से भी सस्ता है।
सस्ता चावल मिलते ही डिस्टिलरीज ने मंडियों से मक्का खरीदना कम कर दिया। ऊपर से मक्के के आयात में भी ढील दी गई। असर सीधा किसान पर पड़ा – मंडियों में मक्का बेचने वाला किसान व्यापारियों के रहमो-करम पर रह गया।
गन्ना किसान का इंतजार अभी खत्म नहीं हुआ
मक्के जैसी ही कहानी गन्ने के साथ भी है, बस किरदार अलग हैं। चीनी मिलें गन्ने के रस और बी-हैवी मोलासेस से इथेनॉल बनाकर तेल कंपनियों को बेच रही हैं। मुनाफा भी कमा रही हैं। लेकिन किसान के हिस्से में? अभी तक कुछ नहीं।
गन्ने का दाम आज भी सिर्फ शुगर रिकवरी के आधार पर तय होता है। सरकारी फॉर्मूले में इथेनॉल से होने वाली कमाई का कोई हिस्सा जोड़ा ही नहीं गया। मिल चीनी बनाए या सीधे इथेनॉल, किसान को दाम वजन और रिकवरी के हिसाब से ही मिलता है।
गन्ना किसान संगठन अब “इथेनॉल प्रीमियम” यानी अतिरिक्त बोनस की मांग कर रहे हैं। सरकार का जवाब है – इथेनॉल से मिलों के पास कैश जल्दी आता है, जिससे किसान को भुगतान समय पर होता है। मगर समय पर भुगतान तो किसान का कानूनी हक है, कोई एहसान नहीं।
किसान संगठनों से चार सवाल
कुछ किसान नेता और संगठन इथेनॉल नीति को किसानों के लिए “मास्टरस्ट्रोक” बता रहे हैं। नीति का समर्थन करना या विरोध, यह उनका अधिकार है। पर कुछ सवालों के जवाब अब भी बाकी हैं।
MSP से कम भाव पर चुप्पी क्यों
कृषि मंत्रालय का अपना डेटा बताता है कि मक्का किसान डेढ़ साल से घाटे में है। नवंबर 2025 में भाव 1634 रुपये तक गिरा। इस पर कोई बड़ा आंदोलन या सरकार को औपचारिक पत्र अब तक सामने नहीं आया।
डिस्टिलरीज को गारंटी, किसान को क्यों नहीं
इथेनॉल कंपनियों को तेल कंपनियों से प्राइस प्रोटेक्शन मिला हुआ है — यानी दाम फिक्स, मुनाफा तय। लेकिन कच्चा माल देने वाले किसान की फसल के लिए ऐसी कोई कानूनी गारंटी नहीं। यह फर्क समझ से परे है।
श्रेय इथेनॉल को, पर बोनस कहां
MSP तो इथेनॉल से पहले भी हर साल बढ़ता रहा है, आज भी बढ़ रहा है। धान, मक्का या गन्ना — किसी भी फसल पर इथेनॉल के नाम पर MSP से ऊपर एक रुपया भी अतिरिक्त नहीं मिल रहा। फिर सामान्य प्रक्रिया का श्रेय इथेनॉल को क्यों दिया जा रहा है?
प्रॉफिट शेयरिंग मॉडल अभी तक क्यों नहीं
अगर नीति सच में किसान-केंद्रित है, तो डिस्टिलरीज को मिलने वाले प्रति लीटर इथेनॉल दाम का एक हिस्सा सीधे किसान के खाते में क्यों नहीं जाता? अभी तक ऐसा कोई मॉडल लागू नहीं हुआ है।
आगे क्या रास्ता बचता है
कृषि मंत्रालय के अपने आंकड़े एक बात साफ कर देते हैं – मौजूदा इथेनॉल नीति में जोखिम किसान का है, फायदा कंपनियों का। मक्का किसान ने उत्पादन बढ़ाकर अपनी तरफ से भरोसा निभाया, लेकिन सस्ते चावल की सप्लाई और आयात में ढील जैसे फैसलों ने उसका नुकसान बढ़ाया।
जब तक मंडियों में MSP पर मक्के की गारंटेड खरीद तय नहीं होती, और गन्ने की कीमत तय करने के फॉर्मूले में इथेनॉल को शामिल करके बोनस नहीं जोड़ा जाता, तब तक यह सवाल बना रहेगा कि “अन्नदाता से ऊर्जादाता” का नारा किसान के लिए है या सिर्फ मार्केटिंग के लिए।
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