Cotton Crisis: भारत कभी दुनिया में कपास उगाने वाला सबसे बड़ा देश हुआ करता था। आज हालत यह है कि हमें बाहर से कपास मंगानी पड़ रही है, और वो भी लगातार बढ़ती मात्रा में। यह चिंता किसी आम आदमी की नहीं, बल्कि देश के जाने-माने कृषि वैज्ञानिक और पद्म भूषण से सम्मानित डॉ. आर.एस. परोदा की है।
आईसीएआर (ICAR) के पूर्व महानिदेशक रह चुके डॉ. परोदा ने सरकार से सीधी अपील की है – GM टेक्नोलॉजी और विज्ञान आधारित नीतियां जल्द अपनाई जाएं, वरना कपास में भारत का पुराना रुतबा वापस आना मुश्किल है।
कपास की खेती मंडराता संकट!…आंकड़े क्या बता रहे हैं?
कॉटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया यानी CAI के हालिया आंकड़े डरावने हैं। 2025-26 सीजन में भारत को करीब 60 लाख गांठ कपास बाहर से मंगानी पड़ सकती है। निर्यात की तस्वीर तो और खराब है – यह गिरकर महज 15 लाख गांठ रह सकता है।
देश के अंदर कपास की खपत बढ़कर 348 लाख गांठ हो चुकी है। मांग और पैदावार के बीच यह फासला अपने आप में एक चेतावनी है। डॉ. परोदा का कहना है कि ये आंकड़े देश को नींद से जगाने के लिए काफी हैं।
2014 तक नंबर वन, अब पहचान खोता देश
आपने भी सोचा होगा कि आखिर भारत जैसा कपास पावरहाउस इस मुकाम पर कैसे पहुंचा? जवाब इतिहास में छिपा है। 2014 तक भारत दुनिया में सबसे ज्यादा कपास उगाने वाला देश था और निर्यात में दूसरे नंबर पर था।
डॉ. परोदा के मुताबिक, एक तरफ आत्मनिर्भर भारत की बात होती है, दूसरी तरफ कपास के लिए विदेशों पर निर्भरता बढ़ती जा रही है। यह विरोधाभास साफ नजर आता है।
मौसम नहीं, नीतियां हैं असली वजह
डॉ. परोदा साफ कहते हैं कि यह सिर्फ खराब मौसम का नतीजा नहीं। जड़ की वजह अलग है – नई सोच और तकनीक को बढ़ावा देने वाली नीतियों की कमी।
पिछले 25 सालों में भारत ने कपास उत्पादन में जो बड़ी कामयाबी हासिल की थी, वो इसी नई सोच की बदौलत मिली थी। मगर पिछले 20 सालों से भारतीय किसानों को नई तकनीक से दूर रखा गया, जबकि दुनिया के बाकी कपास उत्पादक देश आगे बढ़ते रहे।
कपास की खेती आज करीब 70 लाख किसानों की रोजी-रोटी से जुड़ी है। साथ ही कई बड़े उद्योगों को कच्चा माल भी यहीं से मिलता है। असर सिर्फ किसान पर नहीं, पूरी सप्लाई चेन पर पड़ रहा है।
कपास मिशन में GM तकनीक पर चुप्पी
डॉ. परोदा ने सरकार के नए कपास मिशन पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि इस मिशन में जीएम कॉटन जैसी जांची-परखी तकनीक को अपनाने पर कोई ठोस बात नहीं की गई। जबकि यह तकनीक किसान और देश की खेती, दोनों के लिए फायदेमंद साबित हो सकती है।
उन्होंने वाजपेयी सरकार के दौर को याद दिलाया, जब बीटी कॉटन को मंजूरी दी गई थी। उस फैसले ने भारत को दशकों तक कपास उत्पादन में आगे रखा। अब वैसी ही दूरदर्शी सोच की जरूरत फिर से महसूस हो रही है।
अब आगे क्या होना चाहिए?
डॉ. परोदा का मानना है कि भारत को दुनिया के साथ कदम मिलाकर चलना होगा, ताकि खेती में नई वैज्ञानिक खोजें बिना देरी के किसानों तक पहुंचें। सरकारी सिस्टम को पारदर्शी और विज्ञान आधारित बनाना अब टालने वाला मसला नहीं रहा।
अभी यह साफ नहीं है कि सरकार कपास मिशन में GM तकनीक को लेकर आगे क्या रुख अपनाती है। लेकिन आंकड़े बता रहे हैं कि देरी की गुंजाइश ज्यादा नहीं बची। 70 लाख किसानों की कमाई और देश की कपास पहचान, दोनों इसी फैसले पर टिके हैं।
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