Bankers’ Books Evidence Act 2026: बैंक में जमा आपके डिजिटल लेनदेन (Digital transactions) का रिकॉर्ड अब सिर्फ आपके फोन की स्क्रीन तक सीमित नहीं रहेगा। जरूरत पड़ने पर यह अदालत में कानूनी सबूत के तौर पर भी काम आएगा। केंद्र सरकार ने इसके लिए लोकसभा में एक नया विधेयक (Bill) पेश किया है, और यह कदम बैंकिंग क्षेत्र (Banking Sector) के लिए बड़ा बदलाव माना जा रहा है।
केंद्रीय वित्त मंत्री (Union Finance Minister) निर्मला सीतारमण ने बैंकर्स बुक एविडेंस एक्ट, 2026 लोकसभा में पेश किया। इस विधेयक के तहत डिजिटल, इलेक्ट्रॉनिक और क्लाउड में सुरक्षित रखे गए बैंकिंग रिकॉर्ड को भी अदालत में कानूनी सबूत के तौर पर मान्यता मिलेगी।
FM Nirmala Sitharaman introduces The Bankers’ Books Evidence Bill, 2026 | 03 Aug 2026
135 साल पुराना कानून अब इतिहास बनेगा
यह नया विधेयक बैंकर्स बुक साक्ष्य अधिनियम, 1891 की जगह लेगा। यानी करीब 135 साल पुराना कानून अब बदलने वाला है। वजह साफ है – पुराना कानून सिर्फ कागजी बही-खातों को ध्यान में रखकर बनाया गया था, आज की बैंकिंग प्रणाली (Banking system) पूरी तरह डिजिटल हो चुका है।
नया नियम सामान्य बैंकों के साथ-साथ डाकघर की बचत योजनाओं, ईपीएफ और मनी ऑर्डर सेवाओं-कार्यालयों पर भी समान रूप से लागू होगा।
कब मान्य होगा डिजिटल रिकॉर्ड, क्या है शर्त ?
हर डिजिटल रिकॉर्ड अपने आप सबूत नहीं बन जाएगा। यह तभी मान्य होगा जब उसकी प्रामाणिकता और Cyber security मानकों का पूरी तरह पालन किया गया हो।
अदालत में पेश किए जाने वाले कागजी या डिजिटल रिकॉर्ड के साथ एक तय प्रारूप में प्रमाण-पत्र देना अनिवार्य होगा। बिना इस सर्टिफिकेट के रिकॉर्ड को सबूत के तौर पर स्वीकार नहीं किया जाएगा।
बैंक अधिकारियों को कोर्ट के चक्कर से भी राहत
कानूनी मान्यता के अलावा एक और बड़ी राहत बैंक अधिकारियों के लिए है। बैंक की डिजिटल या भौतिक हस्ताक्षर (Physical signature) वाले मान्यता प्राप्त प्रमाण-पत्र से काम चल जाएगा।
अगर किसी मामले में बैंक खुद पक्षकार नहीं है, तो उसके अधिकारियों को मूल रिकॉर्ड पेश करने या गवाह के तौर पर अदालत में हाजिर होने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा। हां, विशेष परिस्थितियों में अदालत उन्हें बुला जरूर सकेगी।
सरकार के पास इस कानून का दायरा अन्य वित्तीय संस्थानों तक बढ़ाने का अधिकार भी होगा। पुराने कानून के तहत चल रहे कोर्ट केसों पर इस नए बदलाव का कोई उल्टा असर नहीं पड़ेगा, यह भी साफ किया गया है।
डिजिटल लेनदेन तो बढ़ा, पर अकाउंटिंग अब भी मैनुअल
एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि भारत में डिजिटल लेनदेन लगातार बढ़ने के बावजूद छोटे और मझोले कारोबार (Medium-sized businesses) आज भी अकाउंटिंग का काम हाथ से कर रहे हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक 69.6% कारोबारियों ने बिल और इनवॉइस प्रोसेसिंग को सबसे बड़ी चुनौती बताया। इसके बाद बैंक-क्रेडिट कार्ड रिकॉन्सिलिएशन 14% और GST रिकॉन्सिलिएशन 8.1% कारोबारियों के लिए मुश्किल रहा।
यानी कंपनियां लेनदेन तो डिजिटल कर चुकी हैं, लेकिन इनवॉइस जुटाना, डेटा दर्ज करना और खाते तैयार करना आज भी काफी हद तक मैनुअली हो रहा है। इससे वित्तीय रिपोर्ट तैयार होने में देरी और गलतियों का खतरा बना रहता है।
अब आगे क्या होगा?
विधेयक अभी लोकसभा में पेश हुआ है। संसद से पारित होने और कानून बनने के बाद ही यह पूरी तरह लागू होगा। बैंकों और वित्तीय संस्थानों को अपने डिजिटल रिकॉर्ड सिस्टम को इसी हिसाब से तैयार करना होगा, ताकि जरूरत पड़ने पर वे कोर्ट में स्वीकार्य सबूत पेश कर सकें।
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“बैंकर्स बुक एविडेंस एक्ट 2026“ से संबंधित महत्वपूर्ण सवाल और उनके जवाब (FAQs):–
यह एक नया विधेयक है जिसे केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने लोकसभा में पेश किया, जिसके तहत डिजिटल, इलेक्ट्रॉनिक और क्लाउड में सुरक्षित बैंकिंग रिकॉर्ड को भी अदालत में कानूनी सबूत माना जाएगा।
यह बैंकर्स बुक साक्ष्य अधिनियम, 1891 की जगह लेगा, जो करीब 135 साल पुराना कानून है।
रिकॉर्ड की प्रामाणिकता और साइबर सुरक्षा मानकों का पालन होना जरूरी है, साथ ही तय प्रारूप में एक प्रमाण-पत्र भी देना होगा।
नहीं, अगर बैंक खुद पक्षकार नहीं है तो अधिकारियों को मूल रिकॉर्ड पेश करने या गवाही देने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा, हालांकि विशेष परिस्थितियों में अदालत उन्हें बुला सकती है।
नहीं, यह सामान्य बैंकों के साथ-साथ डाकघर की बचत योजनाओं, ईपीएफ और मनी ऑर्डर सेवाओं पर भी समान रूप से लागू होगा।
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