घर के किचन में तेल की कीमत क्यों घटती-बढ़ती रहती है, कभी सोचा है? इसकी जड़ अक्सर इम्पोर्ट प्राइस में बदलाव से जुड़ी होती है, और दो दिन पहले ही एक बड़ा अपडेट सामने आया है।
सेंट्रल बोर्ड ऑफ इनडायरेक्ट टैक्सेज एंड कस्टम्स यानी CBIC ने शुक्रवार देर रात एक नोटिफिकेशन जारी करते हुए ज्यादातर खाद्य तेलों का बेस इम्पोर्ट प्राइस 1 से 17 डॉलर प्रति टन तक बढ़ा दिया है। नई दरें शनिवार यानी 1 अगस्त से लागू हो चुकी हैं।
रिफाइंड, ब्लीच्ड और डियोडराइज्ड यानी RBD पाम ऑयल का बेस इम्पोर्ट प्राइस 3 डॉलर प्रति टन घटाया गया है। यानी इस तेल की कीमत में राहत भी मिली है।
बेस इम्पोर्ट प्राइस का मतलब क्या होता है?
यह समझना जरूरी है, क्योंकि सीधे इसी नंबर से ड्यूटी की गणना होती है। जब भी कोई खाद्य तेल भारत में आयात होता है, उस पर लगने वाला टैक्स इसी बेस प्राइस के आधार पर तय होता है।
आमतौर पर हर 15 दिन में इन दरों में बदलाव होता है। इससे पहले दरें 15 जुलाई को संशोधित हुई थीं और अगले दिन से लागू हुई थीं। यानी अब दूसरी फोर्टनाइटली रिवीजन आई है।
किस तेल में कितना बदलाव हुआ?
अब सवाल यह है कि असल आंकड़े क्या कहते हैं। नीचे टेबल में साफ दिख रहा है कि किस तेल का रेट कितना बढ़ा या घटा।
| खाद्य तेल | 1 अगस्त ($/टन) | 15 जुलाई ($/टन) | बदलाव |
|---|---|---|---|
| क्रूड पाम ऑयल | 1,211 | 1,203 | +8 |
| RBD पाम ऑयल | 1,212 | 1,215 | -3 |
| क्रूड पामोलीन | 1,222 | 1,221 | +1 |
| RBD पामोलीन | 1,225 | 1,224 | +1 |
| क्रूड सोयोइल | 1,255 | 1,238 | +17 |
सबसे बड़ा उछाल क्रूड सोयोइल में दिखा है, पूरे 17 डॉलर प्रति टन का इजाफा। क्रूड पाम ऑयल भी 8 डॉलर महंगा हुआ है। पामोलीन के दोनों वेरिएंट में मामूली 1-1 डॉलर की बढ़त है।
भारत के लिए यह आंकड़ा क्यों मायने रखता है
भारत दुनिया में खाद्य तेल का सबसे बड़ा आयातक देश है। इस पूरे इम्पोर्ट में सबसे बड़ा हिस्सा पाम ऑयल का है, जो मुख्य रूप से इंडोनेशिया, मलेशिया और थाईलैंड से आता है।
इसका सीधा असर यह है कि जब भी बेस प्राइस बढ़ता है, आयात शुल्क का बोझ भी बढ़ता है। यह बोझ आगे चलकर किसी न किसी रूप में बाजार भाव तक पहुंच सकता है, हालांकि यह जरूरी नहीं कि हर बार सीधे रिटेल कीमत पर असर दिखे।
डॉलर-रुपये की एक्सचेंज रेट भी इस पूरे गणित में अहम भूमिका निभाती है। फिलहाल 1 अमेरिकी डॉलर की कीमत 95.39 रुपये के आसपास है।
आगे किन बातों पर नजर रखनी चाहिए
अगले रिवीजन की उम्मीद करीब दो हफ्ते बाद, यानी अगस्त के मध्य में की जा सकती है, क्योंकि दरें हर पखवाड़े बदलती हैं। जो कारोबारी और थोक विक्रेता आयात से जुड़े हैं, उन्हें अगली नोटिफिकेशन पर नजर रखनी चाहिए, ड्यूटी कैलकुलेशन इसी पर निर्भर करती है। आम उपभोक्ताओं के लिए फिलहाल सीधा असर दिखना बाकी है, कीमतों में बदलाव आने वाले हफ्तों में साफ होगा।
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