MSP Analysis of Rabi Crops: इस रबी सीजन (अप्रैल-जून) में किसानों के लिए फसलों के दामों का ग्राफ मिला-जुला रहा। हालाँकि पाँच प्रमुख रबी फसलों – गेहूं, चना, सरसों, मसूर और जौ की मंडी कीमतें न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से 5% कम से लेकर 8% अधिक के बीच रहीं। चना को छोड़कर बाकी चार फसलों के दाम अप्रैल से जून के बीच 56 रुपये से लेकर 401 रुपये प्रति क्विंटल तक बढ़े। वहीं चना के भाव में 26 रुपये प्रति क्विंटल की गिरावट दर्ज की गई। मंडियों में मिलने वाले फसलों के भाव किसानों की आमदनी (farmers income) की तस्वीर पेश करते हैं।
रबी फसलों का एमएसपी विश्लेषण (MSP Analysis of Rabi Crops)
सरकारी पोर्टल Agmarknet के मंडी भाव डेटा के अनुसार, अप्रैल-जून में पूरे देश में गेहूं का औसत मंडी भाव 2,465 रुपये प्रति क्विंटल रहा, जो इसके MSP 2,425 रुपये प्रति क्विंटल से 1.6% अधिक है। वहीं जौ के दाम औसतन 2,133 रुपये प्रति क्विंटल रहे, जो 1,980 रुपये की MSP से 7.7% ज्यादा है। जो की किसानों की आमदनी के लिहाज से सकारात्मक संकेत है।
हालांकि, चना और सरसों की कीमतें अप्रैल से जून तक के तीन महीनों में अपनी-अपनी MSP से लगभग 1% नीचे चलीं। प्रमुख रबी दलहन चना के लिए किसानों को औसतन 5,596 रुपये प्रति क्विंटल मिले, जबकि MSP 5,650 रुपये है। सरसों की बात करें तो किसानों ने औसतन 5,899 रुपये प्रति क्विंटल के भाव पर बिक्री की, जबकि MSP 5,950 रुपये निर्धारित है।
सबसे ज्यादा मार मसूर किसानों ने झेली। इसकी कीमतें MSP 6,700 रुपये की तुलना में 4.7% कम, यानी औसतन मात्र 6,384 रुपये प्रति क्विंटल पर सिमट गईं। यानी सीधे तौर पर किसानों को भारी नुकसान हुआ है।
उत्पादन का पैमाना
सरकार ने 2024-25 फसल वर्ष के लिए गेहूं उत्पादन का अनुमान बढ़ाकर रिकॉर्ड 117.51 मिलियन टन (MT) कर दिया है, जो पिछले साल के 113.29 एमटी से 3.7% अधिक है। हालांकि, सरसों/राई का उत्पादन घटकर 12.61 एमटी (पिछले साल 13.26 एमटी) और चना का उत्पादन बढ़कर 11.34 एमटी (पिछले साल 11.04 एमटी) रहने का अनुमान है। मसूर का उत्पादन थोड़ा घटकर 1.77 एमटी (1.79 एमटी) और जौ का उत्पादन बढ़कर 1.84 एमटी (1.7 एमटी) रहने की संभावना है।
अर्थशास्त्र के सेवानिवृत्त प्रोफेसर एसएन दाश कहते हैं, “यह अच्छा है कि अधिकांश रबी फसलों के भाव MSP के आसपास हैं, कुछ तो उससे ऊपर भी हैं। लेकिन एक कारण यह भी है कि रबी फसलों की एमएसपी में 4-7% की बढ़ोतरी की गई थी, जबकि उपभोक्ताओं के लिए अन्य सभी खाद्य पदार्थों की कीमतें कहीं अधिक बढ़ी हैं। ऐसा लगता है कि मंडी में रबी फसलों के भाव भी अन्य कृषि और गैर-कृषि वस्तुओं में मूल्य वृद्धि के साथ तालमेल बिठा रहे हैं, नहीं तो 2-3 साल पहले जब गिरावट होती थी तो वह अक्सर 10% से अधिक होती थी।”
किसान जागरूकता का असर
किसान महापंचायत के नेता रामपाल जाट का दावा है कि किसानों में बढ़ती जागरूकता और आयातित खाद्य तेल की कीमतों का प्रभाव सरसों के भावों को जून में MSP से ऊपर 6,000 रुपये प्रति क्विंटल से अधिक तक ले जाने के प्रमुख कारण हैं। जाट बताते हैं, “हमने किसानों से सरसों 6,000 रुपये प्रति क्विंटल से कम में न बेचने का आह्वान किया था और मार्च में 15 दिनों तक टोंक की एक प्रमुख मंडी में आवक नगण्य रही। यह बात अन्य किसानों में भी फैली और अप्रैल से कीमतें ऊपर चढ़ने लगीं।” Agmarknet डेटा इसकी पुष्टि करता है: मार्च में सरसों का औसत भाव 5,575 रुपये, अप्रैल में 5,813 रुपये, मई में 5,984 रुपये और जून में 6,214 रुपये प्रति क्विंटल रहा।
भंडारण सुधारों की जरूरत
विशेषज्ञों का मानना है कि किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिए सरकार को भंडारण नियमों में और सुधार करने की जरूरत है। वर्तमान में, ज्यादातर व्यापारी ही प्रतिभूति वित्तपोषण (प्लेज फाइनेंसिंग) के तहत फसलों के बदले ऋण सुरक्षित करने का लाभ उठा रहे हैं। बैंक फसल के मौजूदा बाजार मूल्य का केवल 60-70% ही ऋण देते हैं। एक विशेषज्ञ ने स्पष्ट किया, “गेहूं के मामले में ही देखें, अप्रैल से जून के बीच औसत वृद्धि केवल 56 रुपये प्रति क्विंटल थी। अगर एक किसान तीन महीने के लिए 27 रुपये प्रति क्विंटल भंडारण शुल्क अदा करता है, इसके अलावा अपने स्थान से गोदाम और फिर स्थानीय मंडी तक परिवहन की लागत वहन करता है, तो यह वृद्धि न तो उत्साहजनक है और न ही इस प्लेटफॉर्म का उपयोग करने के लिए प्रेरित करती है।” उन्होंने सुझाव दिया कि मूल्य-जोखिम बीमा पर विचार किया जाना चाहिए और इसका प्रीमियम पूरी तरह से सरकार द्वारा सब्सिडाइज्ड होना चाहिए।
यह स्पष्ट है कि MSP केवल एक बेंचमार्क है। असली चुनौती यह सुनिश्चित करने की है कि किसानों को उनकी मेहनत का उचित मूल्य मिले और उनकी आर्थिक सुरक्षा मजबूत हो। मसूर जैसी फसलों में लगातार MSP से नीचे कीमतें, और भंडारण जैसी बुनियादी सुविधाओं तक किसानों की सीमित पहुंच, किसानों की आमदनी बढ़ाने की राह में बड़ी बाधाएं बनी हुई हैं। क्या सरकार और बाजार तंत्र मिलकर इन चुनौतियों का समाधान ढूंढ पाएंगे?
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