अगर आप गुजरात के टेक्सटाइल बिजनेस से जुड़े हैं, तो यह खबर आपके लिए ही है। राज्य का कपड़ा उद्योग इस वक्त एक-दो नहीं, बल्कि चार-पांच मोर्चों पर एक साथ दबाव झेल रहा है। कपास कम पड़ रहा है, लागत बढ़ रही है, बिजली महंगी हो गई है और अब अमेरिका से आया टैरिफ भी सिर दर्द बन गया है।
देश के कुल स्पिनिंग प्रोडक्शन में गुजरात की हिस्सेदारी करीब एक-चौथाई है। कच्चे कपास के उत्पादन में भी यह राज्य करीब एक-तिहाई योगदान देता है। यानी अगर यहां कुछ गड़बड़ होती है, तो असर पूरे देश के टेक्सटाइल सेक्टर पर पड़ता है।
सौराष्ट्र से सूरत तक, हर क्लस्टर पर असर
यह सिर्फ किसी एक शहर या कंपनी की कहानी नहीं है। सौराष्ट्र के जिनिंग यूनिट्स से लेकर सूरत की बुनाई और प्रोसेसिंग फैक्ट्रियों तक, हर जगह दबाव साफ दिख रहा है।
समस्या सिर्फ कच्चे माल की कमी की नहीं है। लागत बढ़ी है, और मांग कमजोर पड़ी है। दोनों मिलकर मार्जिन को खा रहे हैं।
कपास का रकबा घटा, किसान दूसरी फसलों की तरफ
पिछले सीजन में गुजरात में 26.79 लाख हेक्टेयर पर कपास बोया गया था। इस बार यह घटकर 23.62 लाख हेक्टेयर रह गया है।
वजह? मानसून की अनिश्चितता, खेती की बढ़ती लागत और कपास से मिलने वाला कमजोर रिटर्न। सौराष्ट्र और उत्तरी गुजरात के कई किसान अब मूंगफली और दूसरी तिलहनी फसलों की तरफ शिफ्ट हो रहे हैं।
Bt कपास पर गुलाबी सुंडी का प्रकोप भी बढ़ा है। इससे किसानों की लागत भी बढ़ी और जोखिम भी।
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कॉटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया (CAI) के अनुमान के मुताबिक, गुजरात में कपास की प्रेसिंग घटकर करीब 76 लाख गांठ रह गई है। महाराष्ट्र का उत्पादन इसके मुकाबले करीब 85 लाख गांठ बताया जा रहा है।
दाम बढ़े कपास के, कपड़े के नहीं – नुकसान किसका?
कच्चे कपास की कीमत ₹54,000 प्रति कैंडी से बढ़कर ₹66,000 से ऊपर पहुंच गई। धागे के दाम भी बढ़े।
लेकिन तैयार कपड़े की कीमत उस रफ्तार से नहीं बढ़ी। नतीजा? उत्पादक बढ़ी हुई लागत का बोझ पूरी तरह खरीदारों पर नहीं डाल पाए।
सूरत के उद्योग संगठनों का कहना है कि बुनाई और प्रोसेसिंग इकाइयों को ₹2,500 करोड़ से ₹3,000 करोड़ तक का नुकसान हो चुका है। यह छोटी रकम नहीं है।
उत्पादन में कटौती, कई मिलों में काम बंद
कमजोर मांग और बढ़ते स्टॉक ने कई इकाइयों को उत्पादन घटाने पर मजबूर कर दिया है। कुछ मिलों ने अपनी शिफ्ट 50% तक घटा दी है। कुछ ने तो हफ्ते में दो दिन काम पूरी तरह बंद रखने का फैसला ले लिया है।
बिजली की महंगाई ने भी बढ़ाई मुश्किल
राजकोट, कडी और अहमदाबाद की कई मिलें सस्ती कैप्टिव सोलर और विंड पावर पर निर्भर रहती थीं। अब यह सुविधा सीमित हो गई है।
इसका सीधा असर यह हुआ कि इन मिलों को महंगी ग्रिड बिजली पर निर्भर होना पड़ रहा है। लागत यहां भी बढ़ी है।
अमेरिकी टैरिफ का नया झटका
24 जुलाई 2026 से लागू हुए नए अमेरिकी व्यापार ढांचे के तहत भारतीय टेक्सटाइल प्रोडक्ट्स पर 10% अतिरिक्त टैरिफ लग रहा है। यह टाइमिंग गुजरात के उद्योग के लिए और मुश्किल भरी है, क्योंकि पहले से ही मार्जिन दबाव में हैं।
राहत की बात इतनी है कि भारत को कुछ प्रतिस्पर्धी देशों के मुकाबले करीब 2.5 प्रतिशत अंक का फायदा मिला है। लेकिन MFN ड्यूटी जोड़ने के बाद कुल प्रभावी टैरिफ 15.5% से 16% तक पहुंच सकता है।
उद्योग की मांग, सरकार से राहत की उम्मीद
उद्योग संगठनों ने सरकार से कई मांगें रखी हैं:
- CCI के जरिए कच्चे कपास की स्थिर सप्लाई सुनिश्चित हो
- भारत-अमेरिका ट्रेड डील में टैरिफ पर राहत मिले
- औद्योगिक बिजली दरों में अस्थायी छूट दी जाए
- ब्याज सब्सिडी बढ़ाई जाए
अभी यह साफ नहीं है कि सरकार इन मांगों पर कब और कितना अमल करेगी। आने वाले महीनों में इस पर तस्वीर साफ हो सकती है।
आगे क्या होगा?
गुजरात का टेक्सटाइल उद्योग इस वक्त एक साथ कई मोर्चों पर लड़ रहा है – कपास की कमी, बढ़ती लागत, महंगी बिजली और टैरिफ का बोझ। अगर सरकार जल्द राहत नहीं देती, तो छोटी और मझोली इकाइयों पर दबाव और बढ़ सकता है। इस सेक्टर से जुड़े लोगों को आने वाले कुछ महीनों में सरकारी नीतियों और अमेरिका-भारत ट्रेड डील पर करीब से नजर रखनी होगी।
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