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Guar Cultivation Tips: ग्वार की खेती कम लागत में अधिक उत्पादन के लिए कृषि विशेषज्ञों ने जागरूकता शिविर में दिए सुझाव

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Guar Cultivation Tips: गांव खाजा खेड़ा (सिरसा) में मंगलवार को आयोजित एक खास प्रशिक्षण शिविर ने स्थानीय किसानों को ग्वार की आधुनिक खेती की बारीकियों से रूबरू कराया। बदलते मौसम, बढ़ती लागत और घटती पैदावार के दौर में इस तरह के जागरूकता शिविर किसानों के लिए उम्मीद की नई किरण बनकर उभर रहे हैं।

ग्वार की खेती यानी कम खर्च में ज्यादा मुनाफा

ग्वार को अक्सर ‘रेनफेड एरिया की उम्मीद’ कहा जाता है। वजह साफ है — कम लागत, बेहतर मुनाफा और जमीन की उर्वरता में सुधार। यही वजह है कि किसान इसे मूंगफली, सरसों या गेहूं से पहले की फसल के तौर पर पसंद करते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ग्वार खेत में बचा हुआ 25-30% नाइट्रोजन अगली फसल के लिए उपयोगी साबित होता है।

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बुवाई का सही समय और जरूरी सलाह

ग्वार विशेषज्ञ डॉ. बीडी यादव ने बताया कि इसकी बुवाई का सबसे बेहतर समय जून का दूसरा पखवाड़ा होता है। कुछ किसानों ने नहर से सिंचाई वाले खेतों में बुवाई शुरू भी कर दी है, जबकि रानियां ब्लॉक के कई गांव अब भी मानसून का इंतजार कर रहे हैं।

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उन्होंने किसानों से आग्रह किया कि वे बुवाई का काम जून के अंत तक हर हाल में पूरा कर लें और प्रमाणित बीज ही चुनें, ताकि उत्पादन अच्छा मिल सके।

बीमारियों से बचाव जरूरी, बीज उपचार है असरदार

ग्वार की एक आम बीमारी है रूट रॉट, जो फसल की पैदावार को 20 से 45% तक घटा सकती है। इससे बचाव के लिए डॉ. यादव ने प्रति किलो बीज पर 3 ग्राम कार्बेंडाजिम 50% (बविस्टिन) से उपचार करने की सलाह दी। उन्होंने दावा किया कि इस आसान और कम लागत वाले उपाय से 95% तक नियंत्रण संभव है।

साथ ही, उन्होंने प्रति एकड़ 100 किलो सुपर फास्फेट और 15 किलो यूरिया या 35 किलो DAP डालने की भी सिफारिश की।

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बीज की मात्रा, सिंचाई और कीटनाशकों पर विशेष चेतावनी

डॉ. यादव ने कहा कि HG 2-20 किस्म का 3 किलो और HG 365 का 4 किलो बीज प्रति एकड़ पर्याप्त है। उन्होंने यह भी चेताया कि खड़ी फसल में अनावश्यक खरपतवारनाशी (Herbicides), खासतौर पर चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों के लिए, मस्टर्ड जैसी अगली फसलों की वृद्धि पर नकारात्मक असर डाल सकते हैं।

उन्होंने किसानों से ट्यूबवेल से मिलने वाले खारे या सोडिक पानी का उपयोग न करने की भी सख्त हिदायत दी, क्योंकि इससे मिट्टी की संरचना बिगड़ जाती है और फसल की बढ़वार रुक जाती है।

जैविक खाद और मिट्टी परीक्षण की अपील

सेवानिवृत्त एग्रोनॉमिस्ट डॉ. जगदेव सिंह की देखरेख में आयोजित इस शिविर में उन्होंने किसानों से मिट्टी की जांच कराने और अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद प्रयोग करने पर बल दिया। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिकों और कृषि विभाग से नियमित संपर्क ही किसानों को नई तकनीकों से जोड़ सकता है।

शिविर में क्विज़ राउंड भी हुआ जिसमें 5 किसानों को पुरस्कार देकर सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में ग्राम प्रधान रवि कुमार, प्रगतिशील किसान चंद्रभान समेत 65 से ज्यादा किसान मौजूद रहे।

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जगत पाल पिछले 8 वर्षों से एक पेशेवर ब्लॉगर हैं। वे शिक्षा, ऑटो, कृषि समाचार, मंडी भाव, गैजेट्स और बिजनेस जैसे विषयों पर विशेषज्ञता रखते हैं। वर्तमान में वे news.emandirates.com के संपादक और प्रमुख लेखक हैं, जहाँ वे भरोसेमंद और जानकारीपूर्ण कंटेंट प्रदान करते हैं।