गनोड़ा, (बांसवाड़ा): राजस्थान के बांसवाड़ा ज़िले का एक छोटा सा गांव, गनोड़ा। यहां की मिट्टी, तपती गर्मी में अक्सर बारिश का चुपचाप इंतज़ार करती है – की कब बरसात होगी और किसान खेतों में फसलों की बुआई करके फिर से धरती को हरा-भरा करेंगे? लेकिन इसी गांव के एक सेवानिवृत्त शिक्षक (Retired Reacher) और किसान प्रभाशंकर व्यास ने इस ख़ामोशी को हरियाली में बदलने की ठानी है। जहां बाकी खेतों में मार्च के बाद सन्नाटा पसरा रहता है, वहां व्यास जी का खेत आज भी तिल की फ़सल से हरा-भरा लहलहा रहा है।
परंपरा से आगे सोचने की पहल
अक्सर देखा जाता है कि किसान गेहूं की कटाई के बाद अपने खेतों को खाली छोड़ देते हैं। उनका भरोसा सिर्फ मानसून (Monsoon) पर टिका होता है। लेकिन प्रभाशंकर व्यास ने इस परंपरा को चुनौती दी। उन्होंने मार्च में गेहूं की कटाई के तुरंत बाद खाली खेत में तिल की फसल बो दी – वो भी बिना किसी बड़ी लागत या साधन के।
वो बताते हैं कि उन्होंने केवल 280 रुपये में 600 ग्राम तिल का बीज खरीदा और एक बीघा खेत में बुवाई कर दी। किसी ने उम्मीद नहीं की थी कि भीषण गर्मी में यह बीज इतनी ख़ूबसूरती से पनप सकेगा। लेकिन आज वही खेत गर्मी की लपटों के बीच हरियाली की मिसाल बन चुका है।
बिना खाद, बिना सिंचाई – फिर भी हरियाली
प्रभाशंकर व्यास का यह प्रयोग सिर्फ़ कम लागत का नहीं, बल्कि पर्यावरणीय दृष्टिकोण से भी सराहनीय है। वह कहते हैं, “तिल एक ऐसी फसल है जिसे ज्यादा पानी नहीं चाहिए, न ही इसमें मवेशियों का खतरा होता है। हमने इसमें कोई अतिरिक्त खाद नहीं डाली। फिर भी फसल बढ़िया पनप रही है।”
वास्तव में, तिल एक सूखा प्रतिरोधक फसल मानी जाती है जो कम संसाधनों में भी अच्छा उत्पादन देती है। व्यास के अनुसार, इस फसल से उन्हें करीब एक क्विंटल उत्पादन मिलने की संभावना है, जिससे 15 से 20 हजार रुपए की आमदनी हो सकती है।
राहगीरों के लिए भी प्रेरणा
इन दिनों गांव के रास्ते से गुजरने वाला हर राहगीर प्रभाशंकर व्यास के खेत को देखकर ठिठक जाता है। तपती गर्मी के बीच लहराते हरे तिल के पौधे न सिर्फ़ आंखों को सुकून देते हैं, बल्कि दिल में उम्मीद की नमी भी भरते हैं।
व्यास का खेत अब सिर्फ़ एक खेती का टुकड़ा नहीं रहा, यह एक संदेश बन गया है — कि परंपराओं से परे सोचने की हिम्मत हो तो गर्मियों में भी खेत लहलहा सकते हैं।
एक प्रयोग लाखों किसानों की बना प्रेरणा
Agricultural innovation- किसान प्रभाशंकर व्यास का यह प्रयास उन लाखों किसानों के लिए रोशनी की किरण बन सकता है, जो मौसम की मार और संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं। यह कहानी सिर्फ़ एक खेत की नहीं, एक सोच की है — एक बदलाव की शुरुआत की।
आज जब कृषि क्षेत्र में तकनीक और निवेश की बातें होती हैं, वहीं व्यास जैसे किसान यह दिखा रहे हैं कि जमीनी समझ, अनुभव और थोड़ा सा प्रयोग भी कितनी बड़ी सफलता ला सकता है।
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